क्यों मोदी जी ने आडवाणी जी को राष्ट्रपति नहीं बनाया जबकि ये उनके लिए बायें हाथ का खेल था ?

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नमस्कार दोस्तों आप सभी लोगों का हार्दिक स्वागत है। दरअसल सफलता लालकृष्ण आडवाणी को हमेशा धोखा ही देती रही क्योंकि वे अपने विवेक से निर्णय लेने में निपुर्ण नहीं हैं वेसे तो आडवाणी हमेशा वाजपेयी को अपना गुरू कहते थे आडवाणी कुशल राजनीतिज्ञ तो हैं पर वाजपेयी जैसी इच्छा शक्ति उनके अंदर नहीं है।

कई बार आडवाणी अपने बयानों से विवादों में भी फंसे हैं जिसके कारण वे अपनी ही पार्टी के नेताओ की नजरों में भी चुभने लगे।इसके साथ ही 2004 और 2009 की लगातार दो चुनाव की हार भी आडवाणी के जीवन का काला अध्याय बन गयी क्योंकि वे ही उस समय बीजेपी के पोस्टर बॉय जो थे। 2004 लोकसभा चुनाव में हार के बाद जो बड़ी गलती आडवाणी की रही वो नेतृत्व परिवर्तन को स्वीकार न कर खुद ही वेंकैया नायडू को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को कहना और फिर खुद ही अध्यक्ष पद पर काबिज़ होना तब की जब अफवाहें थी कि विरोधी पार्टी कांग्रेस युवा नेता राहुल गाँधी को अध्यक्ष बना रही है जो कि बीजेपी के अन्य नेताओं और सहयोगी दलों के नेताओ को भी यह बात रास नहीं आयी।

वैसे तो आडवाणी के राजनीतिक भविष्य का पतन काफी पहले ही शुरू होने लगा था पर असल ग्रहण तब लगा जब आडवाणी 9 जून 2013 को गोवा में जब बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए इशारा साफ था कि आडवाणी नहीं चाहते कि बैठक में मोदी के नाम का प्रस्ताव लोकसभा चुनावों की कैंपेन कमेटी के प्रमुख के तौर पर रखा जाए, कैम्पेन कमेटी का प्रमुख बनने का मतलब था कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार फिर भी बात यहीं खत्म नहीं होती काफ़ी मान मनोव्वल के बाद भी आडवाणी इस बैठक में शामिल नहीं होते। इसके बाद 13 सितंबर 2013 को बीजेपी की पार्लियामेंटरी बोर्ड की बैठक में मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुने जाने वाली बैठक में भी आडवाणी शामिल नहीं होते। यहाँ जाहिर हो गया कि अब लाल कृष्ण आडवाणी के राजनीतिक भविष्य पर पूर्ण ग्रहण लगने वाला है जिसके राहु ,केतु अमित शाह और मोदी होने वाले हैं।

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी को पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया यानी अब वे किसी भी बड़ी भूमिका में नहीं रहेंगे।
इसके बाद मोदी चाहते तो आडवाणी को उनका 2002 गुजरात दंगों के समय राजनीतिक भविष्य बचाने के लिए उनके उपकार के बदले राष्ट्रपति का पद दे देते पर यहां भी आडवाणी के एक इंटरव्यू ने आग में पेट्रोल डालने का काम किया जो कि मोदी और शाह को बहुत ही ज्यादा चुभी होगी ।

उनका बयान था :- “संवैधानिक और वैधानिक रक्षा कवच के बावजूद इस वक्त वो ताकतें जो लोकतंत्र को कुचल सकती हैं, ज्यादा मजबूत हैं।

चूँकि मैने पहले ही कहा कि आडवाणी महत्वकांक्षी व्यक्ति हैं , दरअसल वे चाहते थे कि 2014 लोकसभा चुनाव में जीत के बाद पार्टी प्रधानमंत्री पद के लिए आगे करे जबकि सारा मजमा मोदी के नाम पर लुटा गया था जो किसी को भी स्वीकार नही रहा होगा।

राष्ट्रपति पद के लिए आडवाणी को न चुने जाने के पीछे के कारण मोदी और शाह का भी ताकतवर और महत्वाकांक्षी होना माना जा सकता है क्योंकि ताकतवर प्रधानमंत्री बनने के लिए या ताकतवर प्रधानमंत्री कभी भी ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति नहीं बनाते जो आगे चलकर उनकी नाक में दम कर दे। क्योंकि मोदी आडवाणी को रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने इसे व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लिए चुना जो राजनीतिक तौर पर भी चुनाव में भी उनके पक्ष में सही था और आगे चलकर भी उनके फैसलों पर उंगली न उठाये।

इसमें कोई शक नहीं है कि अभी भी आडवाणी के कई समर्थक हैं परन्तु अब बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व बदल चुका है,औऱ अब आडवाणी राजनीति के नेपथ्य से भी निकल गए हैं।

तो दोस्तों आज के लिए बस इतना ही, फिर मिलेंगे एक नए पोस्ट में। हमें उम्मीद है आप लोगों को हमारे द्वारा दी गई जानकारी पसंद जरूर आयी होगी। दोस्तों पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें।